Sunday, December 25, 2011

कविता

कभी तुम जो पूछो मुझसे, की प्रेम है कितना,
बताऊंगा कैसे, असीमित है इतना,
धरा सा है व्यापक, है वेदो सा पावन,
मीरा की सी भक्ति, है वीणा सा वादन.

मॅ डरता हू रीतो मे तुम ना खो जाओ,
की जब मॅ पुकारू तुम साथ ना आओ,
समाज़ो का कोहरा, रिवाज़ो की रातें,
इन दोनो मे ओझल, कही खो ना जाओ.

मॅ तुमको ही पाने की चाहत मे जीता,
तुम्ही मेरी राधा, तुम्ही मेरी सीता,
मेरी जीवन सरिता का तुम ही हो वेग,
मॅ प्यासी सी धरती, तुम घनघोर मेघ.

2 comments:

Ambuj........ said...

Only One world "AWESOME" :)
I never knew that you are good in Hindi too.

Akhil.... said...

@Ambuj, Thx :-)